Saturday, December 17, 2022

एक और घोस्ट विलेज!


हमारे क्षेत्र का शायद ये पहला गाँव होगा जो पूर्ण रूप से पलायन कर चुका है, मुझे ये तो समझ नहीं आता की पूरी तरह से ख़ाली गाँवों को भूतहा गाँव (#Ghost
Village) क्यूँ कहते हैं? लेकिन हाँ शायद हमारे पितृ-पूर्वज, उनके द्वारा बसाये गाँव, जमायी गई कूड़ी-पुंगड़ी (घर-मकान,खेत-खलियान) को हमारे द्वारा वीरान, बंजर कर छोड़ जाने को देखकर रोने ज़रूर आते होंगे।
वीडियो में ये जो आप फोटो देख रहे हैं हालाँकि वो वर्ष 2020 की है, लेकिन तब से अब तक वहाँ की स्थिति और भी ख़राब ही हुई है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखण्ड में 40 लाख से ज़्यादा लोग पलायन कर चुके थे और 2.85 लाख घरों में ताले लटके हैं, पलायन की सबसे ज़्यादा मार पौड़ी, अल्मेाड़ा ज़िले पर पड़ी है। उत्तराखंड माइग्रेशन कमीशन का 2018 का एक सर्वे बताता है कि 2011 से 734 गांव आबादी विहीन हुए, जिन्हें घोस्ट विलेज कहा जाने लगा। यानी इन गांवों में कोई नहीं रहता और वहां के घर खंडहर में तब्दील हो गए हैं। दो हजार के लगभग गांव ऐसे हैं, जिनके बंद घरों के दरवाजे पूजा अथवा किसी खास मौके पर ही खुलते हैं। इस सबका का असर खेती पर भी पड़ा है। सरकार भी मानती है कि राज्य गठन से अब तक 70 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर में तब्दील हो गई है। हालांकि, गैर सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो बंजर कृषि भूमि का रकबा एक लाख हेक्टेयर से अधिक है।
अब जरा सोचिए जो स्थिति 2011 में थीं वो क्या सुधरी होंगी? नहीं बल्कि और भी भयावह हो चुकी हैं। वो भी ऐसे हालात में जब प्रदेश के पास ना कोई ऐसा नेता हो, ना कोई दल जिसका कोई दूरगामी विजन हो, साफ़ नीयत हो? जहां भौगोलिक परिस्थितियाँ, रोज़गार, अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ उत्तराखण्ड में हमेशा से चुनौती पूर्ण रही, उनका राज्य बनने के बाद भी ठीक से कोई समाधान न हो सका हो।
उत्तराखण्ड के पहाड़ों में जहां एक ओर जनसंख्या घट रही है वहीं दूसरी ओर जंगल-झाड़ियाँ, जंगली जानवर बढ़ते ही जा रहे हैं, पहले भी हमारे यहाँ तेंदुआ (बाघ) एक आम बात थी और उनके द्वारा घरेलू जानवरों पर हमले की घटनाएँ आम बात थी, लेकिन उनका कभी इंसानों पर हमले की खबरें नहीं आती थी, पर अब पिछले कुछ सालों से तेंदुओं का इंसानों पर हमलों के कई केस सामने आ चुके हैं, तेंदुओं द्वारा इंसानों पर हमला करने की प्रवृति क्यों बढ़ रही है ये चिंता और चिंतन का विषय है। पहाड़ में आदमखोर तेंदुओं की वृद्धि की वजह मैदानी इलाक़ों के तेंदुओं को पहाड़ी जंगलों में छोड़ा जाना भी कारण माना जा रहा है, इस दृष्टि से भी सत्यता की जाँच वि अध्यनन किया जाना चाहिए और इस समस्या के निराकरण के लिए ठोस कदम उठाये जाने चाहिए।
हम पहाड़ी आख़िर और किन-किन समस्यों से निपटेंगे, अगर कोई खेत कर अपना जीवनयापन करने की सोच भी रहा है तो, खेतों की भौगोलिक विषमता, सिंचाई के लिए पानी, बन्दर, सुवर आदि खेती को नुक़सान का सौदा ही बना रहे हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए जितनी राजनीति इच्छा शक्ति की कमी, प्रशासनिक कार्य पद्धति में दोष है, तो उसका का एक और अन्य पक्ष यह भी है कि हम पहाड़ियों की मानसिकता बस नौकरी करने की रह गई है, थोड़ा शारीरिक मेहनत से दूरी रखते हैं। पलायन भी उन ज़िलों में ज़्यादा हुआ है जहां बेहतर शिक्षा या बेहतर शिक्षा के लिए जागरूकता पहले आयी। भी है, पिछले वर्ष मैंने किसी सरकारी आँकड़ों (श्रीनगर में सब्ज़ी बेचने वाले) में पाया था कि 30 से 35 सब्ज़ी बेचने वालों में एक भी पहाड़ी की दुकान नहीं थी।
कोविड माहमारी के बाद कुछ जगह पर घर वापसी हुई है, किंतु यह बेहद कम स्तर पर है, अगर सरकार इन युवाओं का समय रहते साथ न देगी तो कुछ समय में ये भी वापस शहरों की ओर कुछ करने के लिए मजबूर हो जाएँगे।
ऐसा नहीं है कि लोग पहाड़ों में नहीं रहना चाहते हैं, पहाड़ों से शहरों की ओर पलायन करना उसकी मजबूरी है, हर पहाड़ी युवा बेहतर रोज़गार की चाह में बड़े शहरों में आकर, कुछ पैसे कमाकर वापस पहाड़ों में ही अपने घर जाने का सपना पाले रखता है, शहरों के जनसंख्या घनत्व दबाव के, गला काट प्रतिस्पर्धा के गाँव से आये इन सीधे-साधे पर्वर्तीय लोगों का दम घुटता ही रहता है।
पहाड़ों से शहरों की ओर पलायन ना तो पहाड़ों के ही हित में है, ना ही शहरों के ही, सारे बड़े शहरों बढ़ती जनसंख्या घनत्व के कारण कराह रहे हैं, शहरों में लोगों को बेहतर जीवन-शैली, रहन सहन, ख़ान-पान, यातायात व्यवस्था के लिए रोज़ जूझना पड़ रहा है।

Tuesday, October 25, 2022

Visited my Village Home after Long Time || मेरा गाँव - मेरा देश || रोहिणी मल्ली


 पिछले हफ़्ते काफ़ी समय बाद अपने गाँव गया था, गाँव की यात्रा व प्रवास के दौरान अपने कैमरे से वहाँ बिताए कुछ पलों की रिकॉर्डिंग की थी, उसके कुछ अंश आपके लिए प्रस्तुत है।

Went to my village after a long time last week, during this visit I recorded some moments. Here are some parts of it for you. #मेरागाँवमेरादेश #MeraGaonMeraDesh #HomeAround #MGMD #mandir #bhairavnath #oldhouse #Stonehouses #OldDays #villagelife #village #villagevlog #villagelifestyle #FitSpark #Eaglei9 #ActionCamera #DualScreen #Real4K #WiFi #harvesting #harvest #organic #organicfarming #uttarakhand #Cucumber

Saturday, October 15, 2022

क़िस्सा क़मीज़ का और तमीज़ का || पुरानी बातें गाँव की || भाषा - गढ़वाली-हिंदी


 

क़िस्सा क़मीज़ का और तमीज़ का
ये बातें तब की हैं जब इस दुनिया में हमारा कोई वजूद न था, कितना संघर्ष किया होगा हमारे बड़े बुजुर्गों ने, उसकी ये एक छोटी से मिसाल है बस। विडीओ मेरे यू टूब चैनल "मेरा गाँव -मेरा देश"  पर उपलब्ध है।




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Tuesday, May 30, 2017

पूर्वोत्तर यात्रा 9: North East Tour : Journey from Imphal to Moirang, A historical place of Indian independence movement


सामान्यतः लोग जब किसी जगह पहली बार घुमने जाते हैं तो वो अपने रिश्तेदारों या जानकार मित्रों से उस जगह घुमने के लिए सलाह मांगते हैं, लेकिन मैंने ऐसा नही किया या यूं कहूँ कि मुझे इसकी जरूरत ही नही पड़ी और वो इसलिए कि मेरे जिन मित्रों को भी मेरी मणिपुर यात्रा की जानकारी मिली, उन्होंने मुझे बिना पूछे ही बहुत सारी जानकारी व सलाह दे डाली और उनके सुझावों को मैंने भी अपने पास सहेज लिया था |

आशा दीदी के घर से विदा लेकर हम चार लोग मोइरांग के लिए निकल पड़े, इम्फाल से मोइरांग कि दूरी 45 किमी लगभग है, यानि डेढ़ घंटा आराम से, मै भास्कर दा, जोनाथन जी व उनके मित्र | जोनाथन जी हमे घुमाने के लिए अपने मित्र के साथ उनकी कार लेके आये थे, इम्फाल कि गलियों से निकल कर जब हम मुख्य मार्ग पर पहुंचे तो हम बीजेपी कि चुनावी रैली में जाकर फंस गए, हांलांकि हमको बाहर निकलने के लिए ज्यादा परिश्रम नही करना पड़ा लेकिन मुझे इस रैली से यहाँ के विधान सभा चुनावों में बीजेपी की राजनैतिक दावेदारी का आंकलन करने का मौका मिल गया, वैसे मै पहले भी यहाँ के राजनैतिक समीकरण पर यहाँ के लोगों के साथ चर्चा कर चुका था और इस बार के चुनावों में बीजेपी को लोगों का समर्थन मिलता हुआ लग रहा था, लेकिन कुछ लोग नाराज भी थे और उनका कहना था कि बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार बना सकती थी अगर वो कांग्रेसी नेताओं को चुनाव के ठीक पहले पार्टी में शामिल न करते, वैसे भारत का प्रत्येक जन राजनीतिक विश्लेषक है और प्रत्येक राज्य की राजनीति में उसका अपना ही आंकलन रहता है, लेकिन पूर्वोत्तर कि राजनीति एकदम अलग है; खासकर अरुणाचल और मणिपुर की, यहाँ का चलन रहा है की केंद्र में जिसकी सरकार होगी राज्य में भी वही राज करेगा और यकीन ना हो तो दोनों राज्यों की पिछले एक साल की राजनीतिक घटनाक्रमों को याद कर लीजिये, खैर मै अपनी यात्रा पर लौटता हूँ.....

राजनीतिक भीड़ से निकलने के बाद हमारी गाड़ी तेजी से मोइरांग की ओर बढ़ने लगी, लगभग 17 किमी के बाद हमने जापानीज सैनिकों की याद में बनाये गए वार मेमोरियल को पार किया, जिसे Japanese war veterans ने मुख्य इम्फाल से दक्षिण इम्फाल में 17 किमी आगे मोइरांग के रास्ते में बनाया था जिसे नाम दिया गया "Indian Peace Memorial". असल मायनों में ये भारत के सच्चे मित्र थे, आज के प्रसाशनिक दृष्टि से यह स्थान मणिपुर के बिष्णुपुर जिले के नाम्बोल में आता है | आज भी यहाँ जापानीज अपने पुरखों को श्रधांजलि देने आते हैं, हमारे पास आज समय कम था इसलिए हम सीधे मोइरांग के लिए बढ़ते रहे वरना मै इस जगह जरूर जाता | लेकिन इस स्मारक से गुजरते हुए मुझे विजय झा जी का मणिपुर घुमने के सन्दर्भ में दिये गए सुझाव कि याद आ गयी | उनका कहना था कि अगर मणिपुर जा रहे हो तो दो जगह जरूर हो आना, 1- मोरेह, जोकि भारत और बर्मा दोनों देशों का बॉर्डर है और दूसरा INA म्यूजियम यानि Indian National Army (INA) Museum जोकि मोइरांग जिले में ही है और आज संयोग से मैं मोइरांग कि यात्रा पर ही निकला था | यह संग्राहलय भारत कि आजादी में अपने योगदान व संघर्ष को बयान करता है, इसमें सुभाष चन्द्र बोस द्वारा बनायीं गयी इंडियन नेशनल आर्मी यानि आज़ाद हिन्द फौज के सन्दर्भ में लिखे पत्रों, चित्रों, INA सेनानियों के रैंकों के बैज और इस आंदोलन से जुड़े कुछ लेखों को संजोया गया है |

भारत कि आज़ादी के इतिहास में INA, जापानीज सैनिक व मोइरांग (मणिपुर) का अपना अलग ही व महत्वपूर्ण स्थान है, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के उदेश्य से INA ने 2700 किमी दूर सिंगापुर से भारत के कोहिमा व इम्फाल जिले के लिए कूच किया और अप्रैल 1944 में जापानीज सैनिकों कि मदद से उन्होंने भारत में प्रवेश किया | जापानीज सैनिकों कि मदद से INA से तब के असम के कोहिमा जिले (आज का नागालैंड राज्य) व मणिपुर का 2/3 हिस्सा अंग्रेजों से मुक्त करवा दिया और कर्नल एस.ए.मलिक के अधीन मोइरांग को अंग्रेजों से मुक्त क्षेत्र का Provisional Head Quarters बना दिया गया, कर्नल मलिक ने 14 अप्रैल 1944 को मोइरांग में पहली बार देश का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को फहराया | हांलांकि INA के लगभग 26 हजार सैनिकों और लगभग 40 हजार जापानीज सैनिकों कि शहादत अंग्रेजों से कोहिमा और इम्फाल को बहुत समय तक मुक्त न रख पाई लेकिन लगभग 60 हजार ब्रिटिश सैनिकों को इन्होंने मौत के घाट उतार दिया था जोकि ब्रिटिश साम्राज्य के लिए गहरे जख्म से कम न था |

मोइरांग में और कहाँ घुमने जाऊं इस सन्दर्भ में दूसरा सुझाव मुझे पुष्पारानी जी ने इम्फाल में ही दिया जब उनको पता चला कि उनके घर से भोजन के बाद में सीधे मोइरांग जाने वाला हूँ तो उन्होंने मुझे लोकटक लेक और केइबुल लम्जो नेशनल पार्क Keibul Lamjao National Park जरूर हो आने को कहा, शायद इसलिए कि उन्हें मेरी फोटोग्राफी से मेरे प्रकृति प्रेमी होने का भान हो गया था और यही प्रकृति प्रेम मुझे बार-बार दिल्ली जैसी शहरी जिंदगी से मुह मुडवाती रही है |

Loktak lake and Keibul Lamjao National Park इतिहास से इतर जिन लोगों को प्राकृतिक सौन्दर्य में रूचि है उनके लिए मोइरांग में घुमने के लिए लोकटक झील है, Loktak नाम दो शब्दों के जोड़ से बना है Lok = "stream" and tak = "the end" यानि जहाँ पानी कि धारा रुक जाती है, पूर्वोत्तर भारत में ताजे पानी की ये सबसे बड़ी झील है और इस झील को खास बनाते हैं इसके Phumdis यानि तैरते हुए द्वीप | भारत के मणिपुर में विश्व का एकमात्र तैरता राष्ट्रीय पार्क “केइबुल लम्जो नेशनल पार्क” इसी लोकटक लेक का एक हिस्सा है | जोकि मोइरांग का सबसे मुख्य आकर्षण है, इस झील से मोइरांग के लोगों कि आजीविका भी जुडी है |

लेकिन इस बार न तो मेरे मन में और न ही मेरे भाग्य में भारत कि आजादी से जुड़े इन ऐतिहासिक स्थलों व प्राकृतिक स्थलों के भ्रमण का योग बन पाया, वैसे मैं खुद को भू-पर्यटक से ज्यादा सांस्कृतिक व सामाजिक पर्यटक (यात्री) मानता हूँ और इस बार मैंने मणिपुर की इस छोटी सी यात्रा को यहाँ के लोगों से मिलने जुलने उनको समझने के लिए रखी थी, इसलिए मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों से यहाँ मिलना चाहता था और मोइरांग जाने का भास्कर दा का भी उद्देश्य यही था जो मेरे लिए एकदम अनुकूल था |


Black Rice of Manipur
Bhujia made by Black Rice 
Black Rice of Manipur
Made by Black Rice
बातों–बातों में 45 किमी का सफ़र कैंसे पूरा हो गया पता ही न चला और हम भारत कि आज़ादी, आज़ाद हिन्द फ़ौज और नेता जी व भारत के सच्चे मित्र जापानीज़ सेना से जुड़े ऐतिहासिक स्थान मोइरांग में पहुँच चुके थे, सबसे पहले हम जिनके घर में गए वहां हमे यहाँ प्रमुखता से खाए जाने वाले पकोड़े व काले चावल से बने कुछ स्वादिष्ट व्यंजन - छोटी गोल रोटी व भुजिया परोसी गयी, मन में थोडा शंका थी कि कहीं ये मांसाहारी व्यंजन न हो लेकिन जल्दी ही मुझे उसके शुद्ध शाकाहारी होने कि जानकारी दी गयी, पेट भरा होने के बावजूद भी काले चावलों से बने पकवान की हलकी मिठास व उसका कुरकुरापन्न जुबान से ऐसे चिपक गये थे कि हाथ बार–बार प्लेट की और बढ़ जाते, मैंने पहली बार काले चावलों से बने किसी व्यंजन को खाया था और तब से पहले मुझे काले चावलों का ज्ञान भी न था, ये काले चावल देश के एक आध ही राज्यों में उगाया जाता है और मणिपुर उसमे प्रमुख है | मैंने काले चावलों को देखने कि इच्छा जाहिर की लेकिन मुझे उनके दर्शन नही हो पाये इस घर से निकलने के बाद मोइरांग में हमारा लगभग 8-10 घरों जाना हुआ, हम एक घर से निकलकर दूसरे घर में घुस जाते और बातचीत में व्यस्त हो जाते, किसी भी घर में जाकर ये महसूस नही हुआ की मैं किसी ऐसे घर में हूँ जहाँ की भाषा, खान-पान, रीति-रिवाज, भेष-भूषा मेरे से एकदम अलग है, जिस भी घर में हम गए वहां के लोग बड़ी गर्मजोशी से हमारा स्वागत कर रहे थे |

मोइरांग में मेरा एक युवा साथी से परिचय हुआ जो बच्चों को tution पढ़ाते हैं और मणिपुर को शिक्षा, विकास की बुनियाद से अशांति से शांति की और ले जाना चाहता है, उनके साथ कुछ और युवा जुड़े हैं जो इस कार्य में उसका साथ देते हैं, मैंने बातों–बातों में उनसे जानना चाहा की वो दिन भर क्या करते हैं तो पता चला कि वो tution पढ़ाने के आलावा यहाँ के बेरोजगार युवाओं को इन्टनेट के माध्यम से काम ढूंड कर उनको उस काम में व्यस्त रखते हैं, ऐसे ही युवाओं के कारण मणिपुर कि फिजायें बदल रही हैं, जहाँ पहले सूर्यास्त के साथ ही सन्नाटा छा जाता था वहां आज हम बाहर से आये लोग आराम से घूम रहे थे |

एक तो सर्दियों का समय ऊपर से पूर्वोत्तर क्षेत्र जहाँ रात जल्दी हो जाती है, रात के सात बज चुके थे और अभी हम मोइरांग में ही थे, अँधेरा काफी हो चुका था और हमारा लोगों से मिलने का सिलसिला जारी था,जोनाथन जी की चिंता अँधेरे के साथ ही बढ़ने लगी थी और उनके साथ ही मेरे मन में भी एक अजीब सा डर घर कर रहा था, जोनाथन जी को हमे वापस इम्फाल 45 किमी छोड के 17 किमी नाम्बोल वापस भी आना था उनका चिंता करना भी स्वाभाविक था, मैंने भी भास्कर दा से आग्रह कर जल्दी मोइरांग से निकलने कि बात कही और लोगों से मिलते मिलाते हम लगभग रात के 8 बजे मोइरांग से इम्फाल के लिए निकल पड़े, जोनाथन जी ने अपनी चिंता कि असल वजह हमसे साझा की उनका कहना था की यहाँ का एक दौर ऐंसा रहा है जब आप शाम के बाद अगर कहीं जाते हो तो आपको अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता था, या तो आप यहाँ के उग्रवादियों के हाथों मारे जाते या फिर यहाँ कि स्पेशल कमांडो फ़ोर्स के हाथों, जिसके चंगुल में भी आप फंसे, पिसना आपको ही होता, हांलांकि अब हालात उतने बुरे नही थे लेकिन कुछ समय बाद मणिपुर में चुनाव होने वाले थे और चुनावों का माहौल तैयार हो रहा था और ऐसे में यहाँ उग्रवादी घटनाएँ होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं और कोई भी आम नागरिक इस तरह कि तकलीफों से दो-चार नही होना चाहता, इसलिए वो समय से वापस चलने के लिए कह रहे थे | चुनावो के मद्देनज़र बिसेश्वर दा ने भी हमे ये बात कही थी कि आजकल ज्यादा देर तक बाहर घूमना ठीक नही होगा |

रात के नौ बजे हम इम्फाल में दाखिल हुए और घर जाने के बजाय हम भास्कर दा के एक मित्र बिजित जी से मिलने उनके घर चले गए, जोनाथन जी को हमने उनके घर के लिए विदा किया और अब बिजित जी कि जिम्मेदारी पर उनके घर पहुंचे, जिम्मेदारी इसलिए की उन्हें ही आगे हमे हमारे ठिकाने पर पहुचाने कि जिम्मेदारी थी, उनके घर पहुँच कर भी हमे काले चावल से बना एक स्नैक्स खाने को दिया गया जो दिखने में मैदे से बनी मटर जैंसे थी लेकिन स्वाद वही क्रिस्पी व हल्की मिठास से भरी हुयी....यहाँ भी मैंने काले चावलों को देखने कि इच्छा जाहिर कि लेकिन मुझे काले चावल नही मिले, बिजित जी से बात करते हुए पता चला कि वो यहाँ के बिजली विभाग में अधिकारी हैं और बाहर से पढाई के बाद यहाँ जॉब करते हैं, उनसे पता चला कि सरकार ने कम से कम बिजली के क्षेत्र में तो अच्छा काम किया है और इसका मैंने 5 दिनों में खुद भी अनुभव किया |



रात के 10 बज चुके थे और बिसेश्वर दा का भी फ़ोन आना लाजमी था हम भी अब वापस घर लौटने को तैयार थे,बिजित जी के जीजा जी जोकि स्पेशल कमांडो फ़ोर्स में थे वो भी हमे घर छोड़ने साथ आये ताकि बिजित जी को रास्ते में लौटते वक़्त किसी मुसीबत का सामना न करना पड़े, भगवान कि दुआ से हमे पूरे रास्ते कहीं भी किसी प्रकार की मुसीबत का सामना नही करना पड़ा लेकिन जब आप स्थानीय लोगों के मुह से मुसीबत शब्दों को सुनते हैं या उनके द्वारा खुद इतनी सावधानी बरती जाये तो आपके मन में डर का पैदा होना लाजमी है |

रात के लगभग 10:30 बजे घर पहुँचने के साथ ही हमारा तीसरे दिन का सफ़र पूरा हुआ और जब में घर में पहुंचा तो एक स्थानीय नव मित्र को जब पता चला कि मैं मोइरांग गया था तो वो मुझसे पूछा बैठा कि क्या अपने मोइरांग कि लड़कियों को देखा ? मैंने कहा नही तो वो बोला कि पूरे मणिपुर में मोइरांग कि लड़कियां सबसे खुबसूरत होती हैं या मानी जाती हैं और ये बात मुझे वैसे पहले भी किसी ने बताई थी |


रात में भी के लोग कल होनी वाली बिसेश्वर दा कि शादी कि तैयारियों में व्यस्त थे कोई दाल कि सफाई करके उसे भिगोने रख रहा था तो कोई कुछ और मुझे महेश ने अगले दिन सुबह जल्दी तैयार होकर उसके साथ दुल्हन के घर जाने कि बात कही और हम तीसरे दिन को विराम दे कर अपने कमरे में सोने चले गए ..............................|


पूर्वोत्तर (मणिपुर) यात्रा से जुड़े मेरे 9 संस्मरण आप नीचे लिंक पर क्लिक करें के पढ़ सकते हैं 

 आप मेरी मणिपुर यात्रा के दौरान लिए गए अन्य चित्रों को देखना चाहते हैं तो यहाँ Jewel of India (The Land of Jewels) क्लिक करें |

Thursday, April 27, 2017

पूर्वोत्तर यात्रा 8: North East Tour : Thoubal to Imphal Journey and "Eromba" A Manipuri Dish


थौबल से वापस इम्फाल लौटने की घडी आ चुकी थी, जिस तरह हम थौबल आये थे उसी तरह वापस इम्फाल के लिए निकल पड़े, कुछ किमी की दूरी तय करने के बाद हमारे पास दो विकल्प थे एक तो जिस रास्ते हम आये थे उसी रास्ते वापस इरिलबुंग होते हुए इम्फाल जाए या फिर उस राष्ट्रीय राजमार्ग पे चलते रहे जो इम्फाल को मोरे (बर्मा सीमा) से जोड़ती है, हमने नया रास्ता चुना ताकि इम्फाल के दूसरे भाग को भी देखा जा सके भले चलते– चलते ही सही, अबुंग कि लाइव कमंट्री फिर शुरू हो गयी थी, वो बताता जा रहा था और मैं सुनता जा रहा था, रास्ते में हमे कुछ बस्तियां नज़र आयी, अबुंग ने कहा ये सारी बस्तियां अवैध हैं और राजनीतिक संरक्षण के चलते इनका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता, ये आउटर इम्फाल का वह भाग है जहाँ सबसे ज्यादा बंद व दंगे होते हैं, कुछ और किमी कि दूरी तय करने के बाद हमने आउटर इम्फाल का ही एक छोटा सा टाउन क्रॉस किया अबुंग ने उसके बारे में बताते हुए कहा कि यह मणिपुर का रहस्यमयी इलाका है जहाँ चोरी का सामान पता नही कैंसे समा जाता है, यहाँ पुलिस भी आने में कतराती है और आपकी गाड़ी चंद मिनटों में यहाँ से गायब हो सकती है | ये सारी बातें अबुंग चलते-चलते बताता जा रहा था और साथ ही वो मुझे उन रास्तों को भी इशारों से बता रहा था जिनसे हम कम से कम समय में इरिलबुंग पहुँच सकते थे |

इम्फाल में मुझे और भास्कर दा को दो अलग-अलग घरों में भोजन के लिए जाना था, भास्कर दा आशा रानी दीदी के घर भोजन के लिए जाने वाले थे लेकिन भास्कर दा उनके घर का रास्ता नही जानते थे और हम चारों में स्थानीय रास्तों कि जानकारी अबुंग से ज्यादा किसे होगी ये बताने वाली बात नही है इसलिए अबुंग मुझे साथ लेकर सबसे पहले भास्कर दा को आशा दीदी के घर तक छोड़ने गया, वैसे भास्कर दा इतनी जल्दी में थे कि वो हम से पहले निकल गए थे लेकिन जा पहुंचे कहीं ओर, मैं और अबुंग रास्ते में उनका इंतज़ार करते रहे, उनका फ़ोन लगाते रहे लेकिन नेटवर्क प्रोब्लम के कारण बात नही हो पाई तो हम सीधे आशा दीदी के घर जा पहुंचे, थोड़ी देर बाद जैसे तैसे भास्कर दा भी वहां आ पहुंचे, आशा दीदी भी मेरे से भोजन करने की जिद करने लगी तो मैंने आकर खाने को कहा, फिर अबुंग मुझे लेकर निकल पड़ा भाभी के माइके वाले घर में जहाँ उनकी छोटी बहन हमारा इंतज़ार कर रही थी, जो अपने माँ पिताजी के साथ इम्फाल में रहती हैं, वैसे तो वो दिल्ली में ही रहती थी लेकिन पिछले महीने ही दिल्ली से वापस मणिपुर में आकर अपना काम कर रही हैं, वो पेशे से अर्केटेक्ट हैं | भाभी शादी के बाद  से भैया के साथ सहारनपुर में रहती हैं और दोनों दांतों के डॉ हैं | अपनी डाक्टरी कि पढाई के दौरान ही दोनों का प्यार परवान चढ़ा और एक दूसरे के साथ विवाह-सूत्र में बंध गए, उनके दो बच्चे हैं | खैर 12 बजे के बदले हम डेढ़ बजे घर पे पहुँच ही गए, भूख भी जोरों कि लगी थी, भाभी कि बहन से में आज पहली बार मिल रहा था, लेकिन हम फेसबुक और फ़ोन से एक दूसरे से जुड़े रहे हैं, दिल्ली में कई बार मिलने की सोची पर मिलना नही हो पाया था, मेरे उनके घर में पहुँचते ही भाभी के मम्मी-पापा मेरे से मिलने आ गये, मम्मी से मेरी कम ही बात हो पाई लेकिन पापा से काफी बात हुई, इम्फाल में हम जिनके घर में रुके थे वो उनसे भलीभांति परिचित थे, मेरे से हिंदी में बात हो रही थी और अबुंग से मणिपुरी में, चाय के लिए हमने मना कर दिया था तो पहुँचने के कुछ देर बाद ही हमारे लिए भोजन परोसा जाने लगा, दाल, चावल, आलू गोभी कि सब्जी, बीन्स कि सब्जी, चिकेन और मछली कढ़ी और इरोम्बा से खाने की मेज पट चुकी थी, केवल रोटी कि कमी थी वरना पूरा खाना लगभग उत्तर भारतीय ही था बस इरोम्बा को छोड़ दें तो..

इरोम्बा मणिपुर का प्रमुख, प्रसिद्ध व सबसे पसंदीदा व्यंजन है, किसी भी मणिपुरी के सामने इसका जिक्र करो तो स्वाभाविक ही उसके मुह में पानी आ जायेगा, लोगों से सुनी बातों के आधार पर इस व्यंजन से मेरा परिचय तो था लेकिन आज इसे चखने का पहला मौका भी था | चूँकि मै उत्तर भारत से हूँ तो हमारे लिए इसे बनाते वक्त इस बात का बहुत ध्यान रखा गया था और यही वजह थी कि इरोम्बा की सबसे मुख्य सामग्री नगारी यानि किण्वित मछली (fermented fish) को इससे दूर रखा गया था और हमारे लिए भाभी कि मम्मी ने खुद शुद्ध शाकाहारी इरोम्बा बनाया गया था, भाभी कि बहन को अंदेशा था कि मुझे नगारी कि खुशबू अच्छी नही लगेगी इसलिए उन्होंने इसे डालने को मना कर दिया था, मैंने एक कटोरी में थोडा सा इरोम्बा लिया और खाने के साथ थोडा-थोडा करके खाने लगा, स्वाभाविक था कि ये मेरे स्वादअनुसार तो नही था लेकिन ये इतना भी बुरा नही था कि मैं इसे खा न सकूँ, सबकी अपनी–अपनी खान-पान कि शैली होती है और हमे उसको पूरा सम्मान देना चाहिए, इधर मैं एक कटोरी इरोम्बा से ही छक गया था उधर अबुंग इरोम्बा को तबियत से पैले जा रहा था, मै भी खुश था कि उसने मेरे बदले का इरोम्बा भी चट कर दिया था, वरना उसे फेंकना पड़ता क्योंकि मणिपुरी लोग खाने को एक पहर से दूसरे पहर के लिए बचाके नही रखते और खाना फेंकना मुझे बिलकुल भी पसंद नही है |


"Eromba" A Manipuri Dish, Photo Source-Google
इरोम्बा कि सामग्री व बनाए जाने कि विधि – असली इरोम्बा बनाने के लिए थोडा उबले आलू, उबली हुयी हरी सब्जियां जैसे भिन्डी, बीन्स, सेम आदि के साथ नगारी यानि किण्वित मछली (fermented fish) और सुखी लाल मिर्ची कि जरूरत होती है, इन सबको एक बर्तन में एक साथ मसलकर मिलाया जाता है जिससे उसकी चटनी बन जाती है और यदि नकली यानि शाकाहारी इरोम्बा बनाना है तो इससे केवल मछली हटा दो तो शाकाहारी इरोम्बा बन जायेगा | इरोम्बा में नगारी का इस्तेमाल महत्वपूर्ण होता है और इसको बनाए जाने कि भी अपनी एक अलग ही विधि है, नगारी मणिपुर व पूर्वोत्तर राज्यों का एक महत्वपूर्ण भोज्य उत्पाद है जोकि मछली को धुप में बिना नमक के सुखाया जाता है, जिससे मछली को घर में लम्बे समय तक रखा जा सकता है, इसको बनाये जाने कि विधि थोड़ी जटिल और स्वाद अनुसार पूर्वोत्तर राज्यों में अलग-अलग है, नगारी 10 से 15 दिन में तैयार होती इसलिए अभी में इसकी विधि में नही जाना चाहता............................|

Fermented Fish, (Photo Source - Google)
खाना खाके हमारा पेट भर चुका था और आलस हम पर हावी हो रहा था, लेकिन आज ही हमारा मोइरांग जाने का भी प्रोग्राम बन गया था, मोइरांग जाने कि खबर सुनकर भाभी कि बहन ने मुझे वहां लोकटक लेक घूम आने को कहा मैंने भी कहा ठीक है, खाना खाने के बाद आधे घंटे और बैठने के बाद मैंने और अबुंग ने वहां से विदा ली, जाते-जाते भाभी की बहन ने हमे आंवला और जैतून के ताज़ा अचार के कुछ पैकेट थमा दिये जोकि कुछ दिन पहले ही बनाये गये थे और खाने के लिए एकदम तैयार थे | वहाँ  से निकलकर हम सीधे आशा दीदी के घर जा पहुंचे जहाँ भास्कर दा हमारा इंतज़ार कर रहे थे, वहां उनके एक मित्र कार लेकर आने वाले थे जो हमे मोइरांग लेके जाने वाले थे, आशा दीदी के घर पहुँचने के कुछ ही देर बाद भास्कर दा के मित्र भी आ गए थे, उनसे मेरी मुलाकत मणिपुर में पहले ही दिन एअरपोर्ट पर हो चुकी थी इसलिए मुझे उनसे परिचय करने कि अलग से कोई जरूरत नही पड़ी क्योंकि भास्कर दा ने उनको मेरे बारे में गुवाहटी एअरपोर्ट पर ही बता दिया था और मणिपुर एअरपोर्ट में जब हम मिले तो वो पहले ही जिद कर चुके थे कि वो मुझे इम्फाल और मोरे घुमाने ले जायेंगे लेकिन हमने समय कम होने कि वजह से उनको मना कर दिया था लेकिन वो फिर भी न माने और आज हमे मोइरांग लेके जा रहे थे, वैसे अंधे को क्या चाहिए था..........  समय कम था इसलिए हम इम्फाल से सीधे मोइरांग के निकल पड़े ........................| शेष अगली पोस्ट में ............

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