Thursday, April 13, 2017

रहस्य द लैंड ऑफ़ ज्वेल (The Land of Jewel) नाम का और इरिलबुं से थौबल तक का सफर

आज मणिपुर में हमारा तीसरा दिन था, हम थोडा जल्दी उठ गए थे क्योंकि आज हमारा घुमने का प्लान था, इसलिए समय से नहा धोकर तैयार हो चुके थे, आज मेरी किस्मत भी अच्छी थी जो मुझे नहाने के लिए गर्म पानी मिल गया था, कल पूरे दिन छींके आने से अबुंग को लगा कि मुझे ठन्डे पानी में नहाने के कारण सर्दी लग गयी तो सुबह जैसे ही में बाथरूम कि और गया अबुंग पता नही कहाँ से एक बाल्टी में गर्म पानी लेकर आ गया था | सुबह 9 बजे से पहले ही नहा धोकर मै और भास्कर दा घर से निकलने के लिए तैयार थे, अब हम इंतज़ार कर रहे थे उस शख्स का जो हम को ले जाने के लिए गाड़ी लेकर आने वाले थे | घर से निकलने में थोडा वक़्त लगेगा जानकर मैंने सोचा क्यों न थोड़ी देर सोशल मीडिया में अपनी इम्फाल यात्रा के कुछ फोटो ही अपलोड कर लूँ, कल मैंने जो फोटो लीं थी उनमे से मैंने कुछ फोटो को मैंने छांट तो लिया लेकिन अपलोड करते समय एल्बम के नाम को लेकर अटक गया, मै एल्बम का नाम कुछ यूनिक रखना चाहता था जो मणिपुर को प्रस्तुत करता हो और कॉमन भी न हो, जिससे लोगों के मन में इसके प्रति रूचि जगा सके, काफी देर सोचने के बाद जब दिमाग काम नही किया तो मैंने भास्कर दा से पूछा कि जैंसे अरुणाचल को The Land of Rising Sun कहते हैं वैसे ही मणिपुर का भी तो कोई ऐसा नाम, उपनाम होगा, तो उन्होंने कहा कि हाँ ज्वेल करके कुछ है, बस मुझे हिंट मिल गया था तो मैंने Google बाबा कि मदद से मणिपुर का उपनाम ढूंड ही लिया.... The Land of Jewel A Jeweled land” मणिपुर को The Land of Jewel कहने के पीछे का कारण है इसका अंडाकार भू-भाग जोकि चारों ओर से 9 पहाड़ियों ने घिरा हुआ है, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जब मणिपुर गए तब उन्होंने इसको The Jewel of India' कहा था तब से इसे इस नाम से भी जाना जाता है, मैंने फेसबुक में Jewel of India (The Land of Jewel) नाम से एल्बम बनाई और कुछ फोटो उसमे अपलोड कर दिये |

इधर समय 10 के पार हो चुका था और उन महाशय की कोई खबर नही थी, शायद वो कहीं अटक गए थे, जोकि यहाँ कोई बड़ी नही थी, वैसे भास्कर दा ने विकल्प ढूढने शुरू कर दिये, अबुंग और विसेश्वर दा ने तय किया कि हम दोनों को दो टू-वीलर से ले जाया जायेगा, मैने अबुंग के साथ बाइक पर कब्ज़ा जमा लिया और भास्कर दा स्कूटी पे एक और नौजवान साथी संतोष के साथ चल पड़े, मै बहुत समय से मोटर साइकल से कहीं गया नही था तो मै काफी उत्साहित था, 11 बजे के लगभग हम लोग घर से निकले, घर से निकलते ही सबसे पहले अबुंग ने इरिलबुंग बाज़ार में बाइक को सड़क किनारे स्टूल के पास रोका जिसके ऊपर पेट्रोल से भरी कुछ बोतलें रखी थी, मै समझ गया कि वो बाइक में तेल भरवाना चाहता है, बाइक खड़ी कर वो सीधे दुकान के अन्दर गया और शायद उसने तेल का मूल्य पूछा फिर बाहर आ कर उसने हमे बताया कि आज पेट्रोल सस्ता है इसलिए दो लीटर डाल देते हैं अबुंग ने 110 के हिसाब से चार बोतल 440 में खरीद कर दोनों गाड़ी में दो-दो बोतल उड़ेल दी, मणिपुर में पेट्रोल इतना सस्ता क्यों था ये जानने के लिए आपको मेरी पुरानी कुछ पोस्ट को पढना पड़ेगा जिनका लिंक लेख के अंत में रहेगा | गाड़ियों का पेट भरने के बाद हम अपनी मंजिल कि ओर बढ़ चले, मुझे नही पता था कि हम जा कहाँ रहे थे, आज अबुंग सारथी था और मै सवारी |


बाइक चलाते वक़्त अबुंग अपनी धुन में था और मैं अपनी, बीच-बीच में वो अपनी धुन से बाहर निकल कर किसी ओर अपने हाथों से इशारा करके उस जगह या वस्तु के बारे में बताते हुए बाइक चला रहा था और कभी-कभी मैं रास्ते कि ख़ामोशी को तोड़ते हुए अबुंग को कुछ पूछ लेता था, चलते-चलते अबुंग ने कहा तामो (बिसेश्वर दा) का ससुराल आ गया, मुझे लगा कि शायद हम यहाँ थोड़ी देर रुकेंगे लेकिन हम आगे बढ़ गए, मैंने अपना मोबाइल फ़ोन निकालकर फेसबुक लाइव कर दिया था ताकि मेरे वो मित्र जो पूर्वोत्तर से दूर हैं वो भी मेरे साथ यहाँ कि जिंदगी कि कुछ झलक देख लें, सड़क भले ही दोनों किनारों पर बांस व लकड़ी के घरों से घिरी हुई थी लेकिन वहाँ एक आलौकिक शांति छाई थी, लगभग हर घर के पास एक पानी का तालाब था जोकि पूर्वोत्तर में जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग होता है, तालाब के पानी से कुछ महिलाएं नहा रही थीं, कोई कपड़े धो रहा था तो कोई बर्तन, दो चार लोग बांस से बने घर के बाड़े के पास खड़े होकर आपसी बातचीत में व्यस्त थे | हमारे सामने कि सड़क से आते हुए कुछ लोगों को देखकर अबुंग ने कहा कि शायद कोई मर गया है ये लोग उसका क्रियाकर्म से लौट रहे हैं, कुछ दूर जाने पर उसका अंदाज़ा सटीक निकला लेकिन मुझे नही पता कि अबुंग ने किस आधार पर ये बात कही थी | थोडा और आगे जाने पर अबुंग ने इशारा करते हुए कहा नीरज भाई यहाँ से मेरा घर पास है ये मेरे गाँव का रास्ता है, इतने में भास्कर दा स्कूटी में रेस देते हुए हमारे बगल में आके मुझे कहने लगे नीरज अबुंग यहाँ से इरिलबुंग तक कई बार साइकल से आता था और जब कोई अलगाववादी या कोई और संगठन बंद कि घोषणा कर देता था तो ये पैदल ही चल देता था, थांग-टा के प्रति इसका समर्पण गजब का है |

10-12 किमी चलने के बाद भी जब गाड़ी के चक्के नही रुके तो मैंने पूछ ही लिया कि हम जा कहाँ रहे हैं फिर मुझे पता चला कि हम थौबल जा रहे है जो एक छोटा सा टाउन है और थौबल जिले का मुख्यालय है, यहाँ भास्कर दा को अपने कुछ मित्रों से मिलना था और मै घर में बैठकर क्या करता इसलिए इनके पीछे मै भी लद गया था |

थौबल जाते समय रास्ते में हमे छोटी–छोटी पहाड़ियों पर अनानस कि खेती दिख रही थी और मुझे बताया गया कि यहाँ का अनानस का स्वाद बेहतरीन है और शायद भारत का ये इकलौता राज्य है जहाँ किसी फल को केन्द्रित कर उसके नाम से ‘अनानस उत्सव’ (Pineapple Festival) मनाया जाता होगा | जिस युद्ध के कारण पौना ब्रजबासी अमर हो गये थे वो खोंगजोम का युद्ध इसी जिले में लड़ा गया था, लगभग 15 किमी चलने के बाद जब हम मुख्य सड़क से मिले तो मुझे पता चला कि जिस सुनसान सड़क से हम आ रहे थे असल में वह इम्फाल का पिछला भाग था, मुख्य सड़क में आने के बाद शहर कि वही भीड़-भाड़ भरी दौड़-भाग यहाँ भी महसूस हो होने लगी थी, इस सड़क पर चलते-चलते हम मोरे यानि बर्मा तक जा सकते थे लेकिन हम केवल थौबल तक ही जाने वाले थे, सड़क किनारे कुछ महिलाएं दुकान लगाकर सामान बेच रही थी, जिसमे लोकल सब्जियां, अनानस, अन्य फल आदि थे, हम थौबल के लिए आगे बढ़ते ही जा रहे थे, 45 मिनट का सफ़र तय करने के बाद हम थौबल के बाज़ार में पहुँच गए थे, यहाँ केवल हमे कुछ लोगों से मिलना था और यहाँ घुमने का हमारा कोई इरादा नही था और वैसे भी खोंगजोम वार मेमोरियल (इसके बारे में पढने के लिए आप मेरी इस पोस्ट पर क्लिक करें पूर्वोत्तर यात्रा: मणिपुर में पहला दिन, पौना बाज़ार और हेजिंग्पोट की तैयारियां) के अलावा जिला मुख्यालय और आस-पास में ऐसी और कोई जगह थी भी नही जहाँ जाये बिना मैं न रह सकूँ साथ ही हमारे पास समय भी कम था तो जल्दी से लोगों को मिलके इम्फाल वापस जाने कि योजना थी, मै भी यहाँ लोगों से घुलना मिलना ज्यादा उचित समझ रहा था, क्योंकि हर जगह के मनुष्य की प्रकृति भिन्न होती है जिसको समझना बेहद आवश्यक है, प्रकृति कि अपनी प्रकृति लगभग सभी जगह एक समान ही होती है भले ही उसका स्वरुप कितना ही भिन्न क्यों न हो उसके नियम एक होते हैं जिसको समझना बेहद आसान होता है शायद मेरे विचार में केवल .....खैर हम थौबल के मुख्य बाज़ार में पहुँच चुके थे, बाज़ार में हर वो आधुनिक सामान मौजूद था जो आज किसी भी तेजी से विकास कर रहे शहर के लिए आवश्यक होती है, थोडा रास्ते कि भूल-भुलैया में भटकने के बाद आखिरकार हम लोग अपने गंतव्य तक पहुँच चुके थे, जोकि एक स्कूल था और यहाँ पहुँचने से थोडा पहले ही हमे दौड़ते हुए 100-150 बच्चों कि टोली मिली थी जिसे देककर अबुंग बोल पड़ा लो हम सही जगह पहुँच गए हैं, वो इसी स्कूल के बच्चे थे और इंटरवल में धमाल करने जा रहे थे, कहाँ ? ये नही पता, हम लोग एक पब्लिक स्कूल के अन्दर दाखिल हुए, भास्कर दा को जिन महाशय से मिलना था वे स्कूल के संस्थापक व व्यवस्थापक के साथ-साथ वो एक शिक्षक भी थे, जिन्होंने अपनी मेहनत से इस स्कूल को स्थापित किया था, उनसे मिलाने के लिए हमे एक क्लास रूम में ले जाया गया जहाँ वो बच्चों को पढ़ा रहे थे, हमसे मिलने के बाद उन्होंने बच्चों से हमारा परिचय करवाकर भास्कर दा को बच्चों के साथ संवाद करने का न्योता दे डाला, भास्कर दा भी कहाँ पीछे रहने वाले थे, बिन योजना के वो कई घंटे लोगों के साथ संवाद कर सकते थे ये तो बच्चे ही थे, जितनी देर वो बच्चों से संवाद करते रहे मै वहां क्लास रूम में  मौजूद चीजों को स्कैन करने में और उनकी तस्वीरें उतारने में व्यस्त था, मेरे लिए क्लास रूम थोडा अजीब थी वो इसलिए कि यहाँ रूम में दाखिल होने के लिए दरवाजा तो था लेकिन इसके पीछे कि दीवार खुली थी, शायद नया कंस्ट्रक्शन था इसलिए क्लास रूम में केवल तीन तरफ कि दीवारें ही मौजूद थी, क्लास रूम में मेरे लिए एक और बात गौर करने वाली थी वो ये कि यहाँ लड़कों के कानों में भी कुंडल होते हैं जोकि फैशन के लिए नही बल्कि यहाँ कि संस्कृति की निशानी थी |


बच्चों के साथ आधे घंटे बात करने के बाद हम लोग क्लास रूम से बाहर निकल कर स्कूल कि अन्य क्लास रूम से रूबरू होने चल दिये, मुझे डर था कि कहीं किसी और क्लास में भी भास्कर दा को कुछ बोलने को कहा जायेगा तो ये मना तो करेंगे नही लेकिन मुझे इम्फाल में किसी को मना करना पड़ेगा जहाँ आज मेरा लंच करने का प्रोग्राम था, और वो बार-बार मेसेज करके पूछ रहे थे कहाँ पहुंचे,  लेकिन ऐसी नौबत नही आयी, लगभग 10 मिनट में हम पूरा स्कूल घूम लिए थे, स्कूल घुमने के बाद मुझे यहाँ जिस चीज़ कि कमी महसूस हुई वो थी बच्चों के लिए प्ले ग्राउंड की, वैसे यहाँ जगह कि बहुत कमी थी, केवल किताबी शिक्षा ही बच्चों के लिए पूरी नही होती इसके साथ-साथ शारीरिक शिक्षा भी उनके विकास के लिए जरूरी होती है लेकिन मुझे यहाँ इसकी कोई व्यवस्था नजर नही आ रही थी, थोड़ी देर बाद जब हमे स्कूल से थोड़ी दूर स्कूल के ही दूसरे भाग में ले जाया गया तो मुझे मेरे दो सवालों का जवाब मिल गया था पहला ये कि जब हम यहाँ आये थे तो वो बच्चे कहाँ जाने के लिए दौड़ रहे थे और दूसरा ये कि स्कूल के बच्चे कहाँ खेलते होंगे, स्कूल के इस दूसरे भाग में बहुत जगह थी जहाँ छोटे बच्चे खूब खेल सकते थे लेकिन बड़े बच्चों के लिए फिर भी मुझे कोई माकूल जगह नही दिखी रही थी, स्कूल के इस दूसरे भाग में छोटे बच्चों कि क्लास रूम थी, जब हम यहाँ पहुंचे तो बच्चों का इंटरवल टाइम था और बच्चे अपने आप में मस्त थे, कोई अपने टिफ़िन से दावत उड़ा रहा था कोई अपने दोस्तों के साथ खेलने में व्यस्त था, कुछ क्लास रूम में ही बैठकर मस्ती कर रहे थे, हमे देख कर कुछ बच्चे हमारे साथ आंख मिचोली का खेल खेलने लगे, स्कूल में बाहर से आये लोगों को देख कर अक्सर बच्चें उत्साहित हो जाते हैं, हम भी अपने बचपन में स्कूल में आये अजनबियों को देखकर उत्साहित हो जाया करते थे क्योंकि कई बार ये अजनबी अपने साथ कई अनोखी चीजें लेकर बच्चों के सामने प्रदर्शित किया करते थे और हमारे लिए ये एक खेल ही होता था जो हमे दूसरी दुनिया में ले जाते थे भले ही कुछ देर के लिए ही सही |


मेरे गले में लटका कैमरा बच्चों का ध्यान अपनी ओर खिंच रहा था, फोटोग्राफी और कैमरे के कारण वैसे तो मेरे बहुत सारे दोस्त बने हैं लेकिन आज एक ऐसी छोटी सी बच्ची मेरी दोस्त बनी जो भास्कर दा को देखकर गुस्सा हो रही थी, वास्तव में कुछ प्रोफेशन बहुत ही खुबसूरत होते हैं जो आपको दूसरों को खुश रखने का मौका देते हैं और मुझे ख़ुशी है कि उन कुछ खास प्रोफेशन में से एक प्रोफेशन से मै भी जुड़ा हूँ |



थौबल आने का हमारा मकसद पूरा हो चुका था और अब हम वापस इम्फाल जाने के लिए तैयार थे जहाँ कुछ लोग हमारा भोजन के लिए इंतज़ार कर रहे थे, थौबल से इम्फाल का सफ़र व उससे आगे का सफ़र अपनी अगली पोस्ट में लिखूंगा, तब तक आप मेरी पुरानी पोस्ट को पढ़ सकते हैं |


5 comments:

  1. हमेशा की तरह इस बार भी बढिया पोस्ट।

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    1. धन्यवाद अनिल भाई

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  2. बहुत ही बढ़िया यात्रा विवरण

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  3. इस लेखस में बर्मा यानि म्यंमार का जिक्र आया तो बतना भाई कि वहाँ भी नेपाल की बिन पासपोर्ट के जा सकते है या कोई दूसरा उपाय भी है।
    स्कूल में भ्रमण अच्छी बात रही, केवल दस मिनट में पूरा स्कूल देख डाला, कैमरा तो वैसे भी बच्चों को आकर्षित करता ही है।

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